Sunday, 14 September 2014

जज़बात (भाग -1)

1- अजीब ही दस्तूर है इस ज़ालिम दुनिया का,
मुझे मेरे ही दिल की बात सुनने नहीं देती।

2- वक़्त ने दी है कुछ ऐसी मात मुझे,
कि लिखने को अब एहसास भी बाक़ी न रहे। 

3- उलझनों की कश्मकश ने ऐसा जकड़ा है मुझको,
हर राह में अब उलझन ही नज़र आती है। 

4- हालातों ने शराफ़त का लिबास पहना दिया है,
वरना कायल तो हम भी किसी की आशिक़ी के हुआ करते थे। 

5- उलझनों की इस उलझन में इस क़दर उलझ गयी हूँ,
चाहकर भी सुलझने का रास्ता नहीं मिलता। 

6- बस इतना एहतियात बरत दे ए खुदा,
कि ग़ुरूर न हो मुझे इस अफ़साने पर। 

7- मेरी सादगी को ही इस हँसी का कारण रहने दो,
वरना बाजार में मुखौटों की तो कोई कमी नहीं। 

8- स्वार्थ ही सिद्ध करना होता अगर,
दिल की बात दिल ही में न रहती। 

9- भाव खाने की आदत नहीं मुझको,
दो वक़्त की रोटी से पेट भर जाता है मेरा। 

10- कल ही तो हौंसला जुटाया था ख़्वाबों से रुख़ मोड़ने का,
ये वक़्त फिर चला आया उम्मीद की दुहाई लिए।

3 comments:

  1. Feeling of internal voice............

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  2. "भाव खाने की आदत नहीं मुझको,
    दो वक़्त की रोटी से पेट भर जाता है मेरा।" Chaa gye... Actually it brought smile on my face. Commendable...

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