Saturday, 1 November 2014

शख़्सियत (भाग -2)

1-  बहुत शिद्दत से उस शख़्स ने खुद को तराशा है,
दुनिया की भीड़ में भी जो तन्हा ही रह गया।

2- आज अचानक ही उस पर ऐतबार कर लिया मैंने,
कल तलक जो शख़्स अजनबी भर था।

3- उस शख़्स से बने ख़्यालों की डोर अब उलझने लगी है,
दिन-रात जिसे सुलझाने की कोशिश भी मैं कर रही हूँ।

4- कुछ और मुलाक़ातें उस शख़्स से मयस्सर करा दे ए खुदा,
आज का अधूरा अफ़साना जो मुकम्मल कर दें।

5- शायद उस शख़्स की बद्दुआओं का असर हो रहा है,
हर पल जो तेरे-मेरे बीच की दूरियाँ बढ़ रही हैं।

6- अनजाने में ही उस शख़्स का दिल दुख दिया मैंने,
 धीरे-धीरे जो ज़िन्दगी का अहम हिस्सा बनने लगा था।

7- न जाने कौन है वो शख़्स ,
आजकल जिसकी आँखों में मेरी रातों की नींद बस्ती है।

8- बहुत शिद्दत से मुझे जिस शख़्स की तलाश थी,
मुद्दतों बाद आज वो मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा है।

9- इस ख़ास दिन पर तुझे तोहफा क्या दूँ ए दोस्त,
तेरी शख़्सियत ही मुझे ख़ुदा का नवाज़ा कोई तोहफा लगता है।

10- सफलता की धुन में अँधा सा हो गया वो शख़्स,
सारी उम्र जिसको चश्मे की ज़रुरत भी न पड़ी थी।



1 comment:

  1. "न जाने कौन है वो शख़्स ,
    आजकल जिसकी आँखों में मेरी रातों की नींद बस्ती है।" Beauty... I appreciate the thought...

    ReplyDelete