Sunday, 14 August 2016

उल्झे हुए ख़याल............

मुझमें भी कुछ मर रहा है,
शायद ख़्वाहिश है उसका नाम।
ख़्वाहिश- जीने की, मुस्कुराने की,,
रिश्ते निभाने की।।

साँसें चलती तो हैं,
महसूस मग़र कुछ कम होता है।
दिल के अंदर तक ख़ुशी की,,
कोई बात नहीं पहुँचती।।

दुनिया की इस अंधी भीड़ से,
खौफ़-सा आता है मुझको।
ये जीवन भी जैसे कोई,,
तंज़ मालूम होता है।।

मेरे अपने लोग क्यों अचानक ही,
मुझको पराये-से लगते हैं।
तलाशती हूँ हर पल एक वजह,,
कि उनकी रूह से बात हो जाए।।

आँखों में जो ख़्वाब थे,
हाथों की लकीरों से अब।
डरे-डरे से रहते हैं,,
हथेलियों से कुछ कहते हैं।।

होठों की मुस्कान किसी,
अजनबी का एहसास दिलाती है।
देख जिसे बदन में मेरे,,
कंपन-सी उठ जाती है।।

एक हज़ार सवालों से,
सिर मेरा दुखता है।
शक़ वाला जो काँटा है,,
बहुत ज़ोर से चुभता है।।

आँसू कई बार आँखों से,
बाहर आना तो चाहते हैं।
तमाशबीन दुनिया के कारण,,
आँखों में ही रह जाते हैं।।

एक एहसास है कहीं,
मुझको महसूस होता है।
मरा हुआ-सा है वो लेकिन,,
मेरा दिल नहीं छूता है ।।

ज़िंदा दिखना भी मग़र इस दुनिया में,
बेइन्तेहाँ ज़रूरी है।
झूठा ही सही चाहे,,
मुस्कुराना ज़रूरी है।।

बेवजह के ख़याल आजकल,
मुझको हैराँ किया करते हैं।
जी रहे हैं हम फिर भी,,
हर पल में क्यों मरते हैं??

क्या जाने ये,
कैसा दौर है?
ये लिखने वाला भी,,
मैं हूँ या कोई और है??