1- अजीब ही दस्तूर है इस ज़ालिम दुनिया का,
मुझे मेरे ही दिल की बात सुनने नहीं देती।
2- वक़्त ने दी है कुछ ऐसी मात मुझे,
कि लिखने को अब एहसास भी बाक़ी न रहे।
3- उलझनों की कश्मकश ने ऐसा जकड़ा है मुझको,
हर राह में अब उलझन ही नज़र आती है।
4- हालातों ने शराफ़त का लिबास पहना दिया है,
वरना कायल तो हम भी किसी की आशिक़ी के हुआ करते थे।
5- उलझनों की इस उलझन में इस क़दर उलझ गयी हूँ,
चाहकर भी सुलझने का रास्ता नहीं मिलता।
6- बस इतना एहतियात बरत दे ए खुदा,
कि ग़ुरूर न हो मुझे इस अफ़साने पर।
7- मेरी सादगी को ही इस हँसी का कारण रहने दो,
वरना बाजार में मुखौटों की तो कोई कमी नहीं।
8- स्वार्थ ही सिद्ध करना होता अगर,
दिल की बात दिल ही में न रहती।
9- भाव खाने की आदत नहीं मुझको,
दो वक़्त की रोटी से पेट भर जाता है मेरा।
10- कल ही तो हौंसला जुटाया था ख़्वाबों से रुख़ मोड़ने का,
ये वक़्त फिर चला आया उम्मीद की दुहाई लिए।
Feeling of internal voice............
ReplyDeletehahaha.. Shukriya samajh jaane ke liye...... :) :)
Delete"भाव खाने की आदत नहीं मुझको,
ReplyDeleteदो वक़्त की रोटी से पेट भर जाता है मेरा।" Chaa gye... Actually it brought smile on my face. Commendable...