Tuesday, 9 December 2014

एक रात अचानक !

एक रात अचानक कहा उसने,
मुझे तुमसे हो गयी मुहब्बत है।
मेरे दिल पर भी तो आजकल,,
बस तुम्हारी ही एक हुक़ूमत है।।

सालों से मुझे तलाश थी जिसकी,
राज़ दिल का ऐसा मुझे उसने बता दिया।
मज़ाक का एक एहसास था शायद,,
बातों-ही-बातों में जो उसने जता दिया।।

हज़ारों सवाल थे अभी मन  में मेरे,
कुछ उम्मीदें भी थीं मैंने सजायी।
डर रही थी ख़ुद को आज़माने से मैं,,
इश्क़ में अकसर देखी थी वो रुसवायी ।।

इज़हार वो तो कर चुका था,
इंतज़ार था बस मेरे हामी भरने का।
पर जाने क्यों मैंने सोच लिया,,
एहसासों से अपने इनकार करने का।।

हाँ-ना की इस एक कश्मकश में बस,
मैं उलझती रही हर दिन और रात।
वो दूर कहीं चला गया मुझसे,,
और मिटा गया दिल से हर जज़बात।।

आज अकेली हूँ मैं याद में उसकी,
आशिक़ी को उसकी काश मैंने पहचान लिया होता।
क्या मालूम दो जिस्म एक जाँ हो जाते,,
एक-दूजे को पाने का ग़र हमने एहसान किया होता।। 

Saturday, 1 November 2014

शख़्सियत (भाग -2)

1-  बहुत शिद्दत से उस शख़्स ने खुद को तराशा है,
दुनिया की भीड़ में भी जो तन्हा ही रह गया।

2- आज अचानक ही उस पर ऐतबार कर लिया मैंने,
कल तलक जो शख़्स अजनबी भर था।

3- उस शख़्स से बने ख़्यालों की डोर अब उलझने लगी है,
दिन-रात जिसे सुलझाने की कोशिश भी मैं कर रही हूँ।

4- कुछ और मुलाक़ातें उस शख़्स से मयस्सर करा दे ए खुदा,
आज का अधूरा अफ़साना जो मुकम्मल कर दें।

5- शायद उस शख़्स की बद्दुआओं का असर हो रहा है,
हर पल जो तेरे-मेरे बीच की दूरियाँ बढ़ रही हैं।

6- अनजाने में ही उस शख़्स का दिल दुख दिया मैंने,
 धीरे-धीरे जो ज़िन्दगी का अहम हिस्सा बनने लगा था।

7- न जाने कौन है वो शख़्स ,
आजकल जिसकी आँखों में मेरी रातों की नींद बस्ती है।

8- बहुत शिद्दत से मुझे जिस शख़्स की तलाश थी,
मुद्दतों बाद आज वो मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा है।

9- इस ख़ास दिन पर तुझे तोहफा क्या दूँ ए दोस्त,
तेरी शख़्सियत ही मुझे ख़ुदा का नवाज़ा कोई तोहफा लगता है।

10- सफलता की धुन में अँधा सा हो गया वो शख़्स,
सारी उम्र जिसको चश्मे की ज़रुरत भी न पड़ी थी।



Sunday, 14 September 2014

जज़बात (भाग -1)

1- अजीब ही दस्तूर है इस ज़ालिम दुनिया का,
मुझे मेरे ही दिल की बात सुनने नहीं देती।

2- वक़्त ने दी है कुछ ऐसी मात मुझे,
कि लिखने को अब एहसास भी बाक़ी न रहे। 

3- उलझनों की कश्मकश ने ऐसा जकड़ा है मुझको,
हर राह में अब उलझन ही नज़र आती है। 

4- हालातों ने शराफ़त का लिबास पहना दिया है,
वरना कायल तो हम भी किसी की आशिक़ी के हुआ करते थे। 

5- उलझनों की इस उलझन में इस क़दर उलझ गयी हूँ,
चाहकर भी सुलझने का रास्ता नहीं मिलता। 

6- बस इतना एहतियात बरत दे ए खुदा,
कि ग़ुरूर न हो मुझे इस अफ़साने पर। 

7- मेरी सादगी को ही इस हँसी का कारण रहने दो,
वरना बाजार में मुखौटों की तो कोई कमी नहीं। 

8- स्वार्थ ही सिद्ध करना होता अगर,
दिल की बात दिल ही में न रहती। 

9- भाव खाने की आदत नहीं मुझको,
दो वक़्त की रोटी से पेट भर जाता है मेरा। 

10- कल ही तो हौंसला जुटाया था ख़्वाबों से रुख़ मोड़ने का,
ये वक़्त फिर चला आया उम्मीद की दुहाई लिए।

Sunday, 24 August 2014

शख़्सियत (भाग -1)

1- वो दूसरों के जज़बात क्या समझेगा,
    जिसे अपने ही दिल की धड़कनों पर ऐतबार नहीं।

2-  न जाने कौन है वो शख़्स,
    आजकल  जिसकी आँखों में मेरी रातों की नींद बसती है।

3-  वक़्त नहीं है उसके पास मगर,
     मुझे इंतज़ार करना अच्छा लगता है।

4-  वो कहता है मैं इज़हार-ए-मुहब्बत नहीं करती,
     नादान ये नहीं जानता कि लोग सीरत पर नहीं, सूरत पर मरते हैं।

5-   जाने वो कैसा होगा मेरा हमसफ़र,   
      तलाश में जिसकी आज तक गुमशुदा हूँ मैं।

6-   एक दिलकश शायर की तलाश है मुझको,
      मेरे हर अल्फ़ाज़ को जो जीस्त इनायत कर दे।

7-   कुछ अल्फ़ाज़ अपने माशूक के लिए महफूज़ रखे हैं मैंने,
     किसी और का उन्हें सुन लेना मुझे गवारा नहीं।

8- कहने को तो दो आँखों में सारा संसार समा जाता है,
    बस जिसे बस जाना है, वही इन आँखों के सामने नहीं आता।

9-   एक शख्स को यूँ समझने की कोशिश की मैंने,
      मालूम हुआ कि वो ही मुझे कुछ नहीं समझता।

 10-  वो कहता है ज़माने ने उसे शराफ़त का लिबास पहना रखा है ,
    मैं कहती हूँ मुहब्बत ने मेरी मुझे ज़माने में गुनाहगार बना रखा है।