Tuesday, 3 November 2015

ये ज़िन्दगी है मेरी........

ये ज़िन्दगी है मेरी, पर मैं नहीं हूँ
सारी दुनिया है सही, बस मैं नहीं हूँ।

न जाने कैसी कश्मकशों का दौर है,
आईने में क्यों दिखता कोई और है।
किसी के लिए मैं मुझ-सी ही नहीं हूँ,,
हाँ, ये ज़िन्दगी है मेरी पर मैं नहीं हूँ।।

भीड़ का हिस्सा हो जाना मंज़ूर नहीं था,
जीने का तो मगर मुझको सबूर नहीं था।
धीरे-धीरे तरीका वो सीख रही हूँ,,
ये ज़िन्दगी तो है मेरी पर मैं नहीं हूँ।।

हार मान जाने को जी नहीं करता,
कोशिश कर-कर के ये मन नहीं भरता।
अक्सर राहों में ठोकर खा गिरी हूँ,,
ये ज़िन्दगी है मेरी पर मैं नहीं हूँ।।

मन मारने की आदत-सी हो गई है,
हर एक ख्वाहिश ज़हर पी के सो गई है।
मर-मर के आजकल मैं जीने लगी हूँ,,
ये ज़िन्दगी है मेरी पर मैं नहीं हूँ।।   

सारी दुनिया है सही, बस मैं नहीं हूँ
ये ज़िन्दगी है मेरी, पर मैं नहीं हूँ।

Friday, 1 May 2015

जज़बात (भाग- 2)

1. मैं रश्क़ हूँ तेरे सीने की,
ख़लिश करती है जो दिल में तेरे। 

2. उन आँखों में शायद तारीफ़ थी हमारी,
ग़र समझ जाते तो आज तन्हा न होते। 

3. मेरी आँखों के मंज़र तू पढ़ता है अगर,
दिल की आवाज़ को सुनता क्यों नहीं। 

4. है एक कश्मकश कैसे कहूँ,
जज़बात को अल्फ़ाज़ नहीं मिलते।  

5. ख़ास कह दिया है तुमने हमको जब से अपना,
ये दिल बस कश्मकशों के समुंदर में हिचकोले खा रहा है। 

6. कह पाते नहीं जो कभी किसी से,
जज़बात वो काग़ज़ पर उतार देते हैं हम। 

7. जकड़े हुए थे जज़बात जो दिल में कभी,
वो अब फ़िज़ाओं संग बह रहे हैं। 

8. कर लूँ इश्क़ इस बंजारेपन से, 
या ख़्वाबों में उनकी राह तकती जाऊँ। 

9. हुनर है मुझमें तेरी ख़ामोशियों को पढ़ लेने का,
यूँहीं मुझको तू बेवफ़ा ना समझ।

10. सहारे की ज़रुरत नहीं हमको,
बस एक तेरे साथ की उम्मीद है।


Tuesday, 24 March 2015

चुलबुले हमारे चूहेराम

चुलबुले हमारे चूहेराम,
कभी न करते थे आराम।
कूदते रहते यहाँ से वहाँ,,
जाने उनको जाना था कहाँ।।

भागते रहते इधर-उधर,
थी न उनको कुछ भी ख़बर।
नाक में थोड़ा दम थे करते,,
जितना मारो नहीं सुधरते।।

बढ़ा देते थे हमारा काम,
चुलबुले हमारे चूहेराम।

नन्हे से आये थे घर में,
रहते थे दिल के अंदर में।
करते थे बहुत शैतानी,,
बात हमारी कभी न मानी।।

न करने देते हमको आराम,
चुलबुले हमारे चूहेराम।

चले गए हैं छोड़कर हमको,
छोड़ गए हैं इस वतन को।
हुए वीरगति को प्राप्त,,
कभी किया नहीं हम पे आघात।।

किया रोशन हमारा नाम,
चुलबुले हमारे चूहेराम।

अब हमसे दूर हो गए तुम,
हम हैं तुम्हारी याद में गुम।
जी भर के अब करो विश्राम,,
चुलबुले हमारे चूहेराम।।

वो मासूम सी निंदिया तुम्हारी,
वो उबासी बहुत ही प्यारी।
सब हमको बहुत सतायेगा,,
हर लम्हा अब याद आएगा। .

पर तुम सदा रहोगे हमारी शान,
चुलबुले हमारे चूहेराम।


Friday, 16 January 2015

मेरा अज़ीज़ दोस्त

एक दोस्त है मेरा बहुत अज़ीज़,
ध्यान में जिसके रहती हर चीज़।

लिखती हूँ जब मैं नग़मा कोई,
वो शौक़ से उसको पढ़ता है।
तहरीर का मेरी हर एक शब्द,,
उसको तो बहुत ही जचता है।।

जब कभी हौंसला हार जाती हूँ  मैं,
साथ मेरे उस पल वो हो जाता है।
ग़र आँखों से आंसू गिर जाए मेरी,,
दिल उसका भी उदास हो जाता है।।

एक दोस्त है मेरा बहुत अज़ीज़,
ध्यान में जिसके रहती हर चीज़।

एक दिन आकर वो बोला मुझसे,
देखा  है मैंने हर काम तेरा।
ये निश्चय कर लिया है अब मैंने,,
'लेखिका' है अब से नाम तेरा।।

उसकी दुआओं का असर तो है,
कि हुनर मेरा ये निखरा है।
चाहने वाले बढ़ रहे हैं हर दिन,,
ऐसे मेरा हर शब्द बिखरा है।।

एक दोस्त है मेरा बहुत अज़ीज़,
ध्यान में जिसके रहती हर चीज़।

वो अकसर ये कहता है मुझसे,
लेखिका तू बहुत प्यारी है।
अब कैसे मैं ये समझाऊँ उसे,,
प्यारी ये दोस्ती हमारी है।।

मेरे अज़ीज़ दोस्त के दामन में,
ए खुदा बस खुशियाँ ही भर दे।
कुछ ऐसा तोहफ़ा दे तू उसको,,
जीवन उसका जो तर कर दे।।

एक दोस्त है मेरा बहुत अज़ीज़,
ध्यान में जिसके रहती हर चीज़।।