Saturday, 31 December 2016

क़ैद

दुनिया से अलग-थलग,
ख़ुद को तन्हा कर लिया है।
दिल के इक टुकड़े के अंदर,,
इस साल को क़ैद कर दिया है।

कुछ बातों से अफ़साने बने
कुछ अपने थे, बेग़ाने बने
कुछ ख़ुशियाँ क़दम चूम गयीं
कुछ हसरतें मन की झूम गयीं
कुछ लफ़्ज़ हमसफ़र हुए
कुछ रिश्ते बेअसर हुए...

हुआ जो भी शिद्दत से,
वो सब याद कर लिया है।
दिल के इक टुकड़े के अंदर
इस साल को क़ैद कर दिया है।।

प्रतिभा को नयी पहचान मिली
लबों पर भी मुस्कान खिली
इक दोस्त मेरा यार हुआ
जीवन मेरा बाज़ार हुआ
हक़ीक़त हो गया एक ख़्वाब
मिले कुछ सवालों के जवाब...

इन सारी ही बातों से,
मैंने ख़ुद को भर लिया है।
दिल के इक टुकड़े के अंदर,,
इस साल को क़ैद कर दिया है।।

कुछ अजनबी हमदम हुए
कुछ दोस्त हमक़दम हुए
कुछ राहों से मैं गुज़र गयी
कभी इधर तो कभी उधर गयी
परिवर्तन हुआ शख़्सियत में
थोड़ा बिगड़ी कुछ सुधर गयी...

इस सुधार को मैंने अपना,
जीस्त-ओ-जुनूँ कर लिया है।
दिल के इक कोने के अंदर,,
इस साल को क़ैद कर दिया है।।

मस्ती भरे कुछ लम्हें मिले
कभी ख़ामखाँ मैंने लब सिले
कुछ ग़मों को दिल से दूर किया
उन्हें हँसने को मजबूर किया
कुछ आँसुओं को पी लिया
इक लम्हा जी भर जी लिया...

हर हसीं जज़बात को,
अब वैध कर लिया है।
दिल के इक कोने के अंदर,,
इस साल को क़ैद कर दिया है।।

आज साल की आख़िरी रात है
कल नए साल की शुरुआत है
आज उम्मीद नयी लगाऊँगी
तो कल पूरी कर पाऊँगी
इक दास्ताँ नयी बनाऊँगी
मैं बस चलती जाऊँगी...

कुछ नए सपनों के साथ,
नए साल का स्वागत करना है।
दिल के दूजे टुकड़े के अंदर
उसको भी क़ैद करना है।।  


Sunday, 14 August 2016

उल्झे हुए ख़याल............

मुझमें भी कुछ मर रहा है,
शायद ख़्वाहिश है उसका नाम।
ख़्वाहिश- जीने की, मुस्कुराने की,,
रिश्ते निभाने की।।

साँसें चलती तो हैं,
महसूस मग़र कुछ कम होता है।
दिल के अंदर तक ख़ुशी की,,
कोई बात नहीं पहुँचती।।

दुनिया की इस अंधी भीड़ से,
खौफ़-सा आता है मुझको।
ये जीवन भी जैसे कोई,,
तंज़ मालूम होता है।।

मेरे अपने लोग क्यों अचानक ही,
मुझको पराये-से लगते हैं।
तलाशती हूँ हर पल एक वजह,,
कि उनकी रूह से बात हो जाए।।

आँखों में जो ख़्वाब थे,
हाथों की लकीरों से अब।
डरे-डरे से रहते हैं,,
हथेलियों से कुछ कहते हैं।।

होठों की मुस्कान किसी,
अजनबी का एहसास दिलाती है।
देख जिसे बदन में मेरे,,
कंपन-सी उठ जाती है।।

एक हज़ार सवालों से,
सिर मेरा दुखता है।
शक़ वाला जो काँटा है,,
बहुत ज़ोर से चुभता है।।

आँसू कई बार आँखों से,
बाहर आना तो चाहते हैं।
तमाशबीन दुनिया के कारण,,
आँखों में ही रह जाते हैं।।

एक एहसास है कहीं,
मुझको महसूस होता है।
मरा हुआ-सा है वो लेकिन,,
मेरा दिल नहीं छूता है ।।

ज़िंदा दिखना भी मग़र इस दुनिया में,
बेइन्तेहाँ ज़रूरी है।
झूठा ही सही चाहे,,
मुस्कुराना ज़रूरी है।।

बेवजह के ख़याल आजकल,
मुझको हैराँ किया करते हैं।
जी रहे हैं हम फिर भी,,
हर पल में क्यों मरते हैं??

क्या जाने ये,
कैसा दौर है?
ये लिखने वाला भी,,
मैं हूँ या कोई और है??

Tuesday, 12 April 2016

याद

1. मुश्क़िल था बहुत उसके लिए हर शाम उस राह से गुज़रना,
जहाँ 'उसके' साथ वो बस एक शाम चली थी।

2. मिलने की उससे वो अब कोई उम्मीद नहीं रखती,
डर है उसको कहीं फिर इश्क़ न हो जाए। 
 
3. हर शाम वो लम्हें याद किया करती थी बस,
वो शख़्स तो उसके ज़हन से कब का निकल चुका था।

4. वो भूला नहीं था शायद उसको,
इसलिए उसे भी 'वो' याद दिन-रात आया करता था।

5. हक़ीक़तों से इश्क़ करता था 'वो,'
वो मग़र उसी के साथ सपने सजाती थी। 
 
6. सुन तो लिया था उसने उसको,
अब धीरे-धीरे बुन रही थी। 
 
7. वो इत्मिनान से कहाँ मिला करती थी उससे, 
'वो' बस राह में टकरा जाया करता था। 
 
8. भूला कहाँ था वो उसको,
वो बिना वजह ही शिकायत करती थी। 
 
9. 'वो' दोस्त से ज़्यादा कुछ ना समझ सका उसको,
वो मग़र इश्क़ को दोस्ती से अलग ना कर पायी। 
 
10. हर दिन बातें करते तो थे वो,
हर रात फिर भी कुछ अनकहा रह जाता था।

Friday, 19 February 2016

मग़र...

1. छुआ नहीं था कभी उसने उसको,
गले लगाने की मग़र चाह उमड़ती थी। 

2. छोड़ गया था वो उसे उन तन्हा रास्तों पर,
उसके क़दमों की आहट आज भी जहाँ वो सुनती है। 

3. भीड़ का हिस्सा कैसे कर सकती थी वो उसे,
ज़हन में उसके बसता था वो शख़्स।

4. वो अचानक ही ख़ामोश हो गया था,
इसलिए 'उसकी' कलम इतना बोलने लगी थी। 

5.  वो अकसर समझदार बताया करता था उसको,
हाल-ए-दिल मग़र उसका वो कहाँ समझती थी।   

6. वाक़िफ़ होने लगी थी उसकी आनाकानियों से वो,
दिल को मग़र अपने बहला नहीं पाती थी। 

7. वो दिल की बात कह तो देती मग़र,
जानती थी सच सुनने का हौंसला उसमें नहीं है। 

8. आंधी की तरह आया था एक शख़्स, 
टूटे पत्ते की तरह जिसके साथ वो बहती चली गई। 

9. वो खुश रहे बस इस ख़ातिर,
'उसका' साथ होना ज़रूरी था।

10. उस महफ़िल का हिस्सा होकर क्या करे वो,
तवज्जो देने को उसे जहाँ  'वो' न हो।