Friday, 19 February 2016

मग़र...

1. छुआ नहीं था कभी उसने उसको,
गले लगाने की मग़र चाह उमड़ती थी। 

2. छोड़ गया था वो उसे उन तन्हा रास्तों पर,
उसके क़दमों की आहट आज भी जहाँ वो सुनती है। 

3. भीड़ का हिस्सा कैसे कर सकती थी वो उसे,
ज़हन में उसके बसता था वो शख़्स।

4. वो अचानक ही ख़ामोश हो गया था,
इसलिए 'उसकी' कलम इतना बोलने लगी थी। 

5.  वो अकसर समझदार बताया करता था उसको,
हाल-ए-दिल मग़र उसका वो कहाँ समझती थी।   

6. वाक़िफ़ होने लगी थी उसकी आनाकानियों से वो,
दिल को मग़र अपने बहला नहीं पाती थी। 

7. वो दिल की बात कह तो देती मग़र,
जानती थी सच सुनने का हौंसला उसमें नहीं है। 

8. आंधी की तरह आया था एक शख़्स, 
टूटे पत्ते की तरह जिसके साथ वो बहती चली गई। 

9. वो खुश रहे बस इस ख़ातिर,
'उसका' साथ होना ज़रूरी था।

10. उस महफ़िल का हिस्सा होकर क्या करे वो,
तवज्जो देने को उसे जहाँ  'वो' न हो।