Sunday, 24 August 2014

शख़्सियत (भाग -1)

1- वो दूसरों के जज़बात क्या समझेगा,
    जिसे अपने ही दिल की धड़कनों पर ऐतबार नहीं।

2-  न जाने कौन है वो शख़्स,
    आजकल  जिसकी आँखों में मेरी रातों की नींद बसती है।

3-  वक़्त नहीं है उसके पास मगर,
     मुझे इंतज़ार करना अच्छा लगता है।

4-  वो कहता है मैं इज़हार-ए-मुहब्बत नहीं करती,
     नादान ये नहीं जानता कि लोग सीरत पर नहीं, सूरत पर मरते हैं।

5-   जाने वो कैसा होगा मेरा हमसफ़र,   
      तलाश में जिसकी आज तक गुमशुदा हूँ मैं।

6-   एक दिलकश शायर की तलाश है मुझको,
      मेरे हर अल्फ़ाज़ को जो जीस्त इनायत कर दे।

7-   कुछ अल्फ़ाज़ अपने माशूक के लिए महफूज़ रखे हैं मैंने,
     किसी और का उन्हें सुन लेना मुझे गवारा नहीं।

8- कहने को तो दो आँखों में सारा संसार समा जाता है,
    बस जिसे बस जाना है, वही इन आँखों के सामने नहीं आता।

9-   एक शख्स को यूँ समझने की कोशिश की मैंने,
      मालूम हुआ कि वो ही मुझे कुछ नहीं समझता।

 10-  वो कहता है ज़माने ने उसे शराफ़त का लिबास पहना रखा है ,
    मैं कहती हूँ मुहब्बत ने मेरी मुझे ज़माने में गुनाहगार बना रखा है।

4 comments:

  1. 1 to 10 all are fantastic...!!!!!! :* :*

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  2. "कुछ अल्फ़ाज़ अपने माशूक के लिए महफूज़ रखे हैं मैंने,
    किसी और का उन्हें सुन लेना मुझे गवारा नहीं।" Best lines...

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