एक दुनिया उमड़ आती है
मेरी नज़रों के सामने
जब कभी अनजाने में
मेरे दिमाग़ की
किसी नस के
एक छोर से दूसरे तक
अचानक तुम्हारा
नाम गुज़रता है।
बेख़बर फिर इस दुनिया से
जो मेरे इर्द-गिर्द टहलती है
मेरी आंखें पल-पल
तलाशती हैं
तुम्हारी उसी रूह को
जिसके साथ कभी
मेरी परछाई ने
कुछ छोटे-बड़े
ख़्वाब बुने थे
और जिनकी कदर
तुमने वक़्त-बेवक़्त
अपनी सहूलियत के हिसाब से
बख़ूबी की थी।
न मेरी
न मेरे ख़्वाबों की
मैं भूल जाऊंगी कि
मेरे इश्क़ को इतना साहस था
जो तुम्हारी इजाज़त बिना
इसने मेरे हर इक तस्ववुर को
हर बार तुम्हारा चेहरा दिया
और हर चिंता तुम्हारी
मेरी चिता में राख़ हो जाएगी।
