Thursday, 7 March 2019

साहस-ए-इश्क़

एक दुनिया उमड़ आती है
                                                        मेरी नज़रों के सामने
जब कभी अनजाने में
मेरे दिमाग़ की 
किसी नस के 
एक छोर से दूसरे तक 
अचानक तुम्हारा 
नाम गुज़रता है।

बेख़बर फिर इस दुनिया से
जो मेरे इर्द-गिर्द टहलती है
मेरी आंखें पल-पल
तलाशती हैं
तुम्हारी उसी रूह को
जिसके साथ कभी
मेरी परछाई ने
कुछ छोटे-बड़े 
ख़्वाब बुने थे
और जिनकी कदर 
तुमने वक़्त-बेवक़्त
अपनी सहूलियत के हिसाब से
बख़ूबी की थी।


पर तुम चिंता मत करना
न मेरी 
न मेरे ख़्वाबों की
मैं भूल जाऊंगी कि
मेरे इश्क़ को इतना साहस था
जो तुम्हारी इजाज़त बिना
इसने मेरे हर इक तस्ववुर को
हर बार तुम्हारा चेहरा दिया
और हर चिंता तुम्हारी 
मेरी चिता में राख़ हो जाएगी।

Tuesday, 18 April 2017

क़ैदख़ाना

दुनिया के इस क़ैदख़ाने में
हम जकड़े हुए हैं
इल्ज़ामातों की ज़ंजीरों से।

हर गुनाह के लिए महज़,
हम ही ज़िम्मेदार हैं।
दुनियावाले भी मगर,
इसमें हिस्सेदार हैं।

सारा इल्म हमको ही हो,
हर गुनाह हमसे ही हो।
हर लम्हें में रुस्वाई है,
क्यों ख़ुदा ऐसी क़िस्मत बनायी है ?

तन्हा ही गर रहा करते हम
कम-से-कम शिकायतों का
ये दौर तो नहीं होता।

दर्द इन उम्मीदों का,
हमको कमज़ोर ना कर पाता।
हालात चाहें जैसे होते,
हमको मगर जीना तो आता।

किस-किस ने क्या-क्या सिखलाया,
नहीं हमको इससे कोई वास्ता।
सब कुछ कर के देखा हमने,
गलत हमारा ही हर रास्ता।

सबके ग़मों का हम ही सबब
सबकी रुस्वाइयों का अंजाम
अब ज़ीस्त का इस क्या करें?

करते हैं इंतज़ार अभी,
कुछ और इल्ज़मातों का।
आख़िर हमको ही होना है,
ज़िम्मेदार सब हालातों का।

सवाल अब हम किससे करें,
हर नज़र में हम गुनाहगार हैं।
ताउम्र हम नासमझ रहेंगे,
बाक़ी यहाँ सब समझदार हैं।

कोई ज़रा बतला दे हमको
क्या करें अब हम
अपनी इस शख़्सियत का ?

चुभते हैं हम आजकल,
लोगों की निगाहों में।
कोई क्या करेगा इश्क़ हमसे,
क्या ख़ाक भरेगा बाहों में?

हम हैं अपनी मर्ज़ी के मालिक,
इसमें तो कोई शक नहीं।
जाँचते जाएँ किरदार हमारा
दुनियावालों को ये हक़ नहीं।

Saturday, 28 January 2017

नाउम्मीदियाँ

चल रहा है पथिक, थका हुआ सा राहों में
तकता है हर दिन, बेमक़सद-सा मंज़िल को।

है लहु-लुहान संघर्षों से, शब-ओ-सहर एक है
हर दिन करता है नयी उम्मीद, पर नाउम्मीदियाँ भी अनेक हैं।

लड़खड़ाते हैं जब भी क़दम, वो अश्रुओं से संभालता है
मन का ग़ुबार भी कभी-कभी, हौले-हौले पिघलता है।

दिल-ओ-जान से चाहता है वो, अपनी मंज़िल को पा लेना 
हर ख़्वाब नींद से कहता है, तुम मुझको भी जगा लेना। 

Saturday, 31 December 2016

क़ैद

दुनिया से अलग-थलग,
ख़ुद को तन्हा कर लिया है।
दिल के इक टुकड़े के अंदर,,
इस साल को क़ैद कर दिया है।

कुछ बातों से अफ़साने बने
कुछ अपने थे, बेग़ाने बने
कुछ ख़ुशियाँ क़दम चूम गयीं
कुछ हसरतें मन की झूम गयीं
कुछ लफ़्ज़ हमसफ़र हुए
कुछ रिश्ते बेअसर हुए...

हुआ जो भी शिद्दत से,
वो सब याद कर लिया है।
दिल के इक टुकड़े के अंदर
इस साल को क़ैद कर दिया है।।

प्रतिभा को नयी पहचान मिली
लबों पर भी मुस्कान खिली
इक दोस्त मेरा यार हुआ
जीवन मेरा बाज़ार हुआ
हक़ीक़त हो गया एक ख़्वाब
मिले कुछ सवालों के जवाब...

इन सारी ही बातों से,
मैंने ख़ुद को भर लिया है।
दिल के इक टुकड़े के अंदर,,
इस साल को क़ैद कर दिया है।।

कुछ अजनबी हमदम हुए
कुछ दोस्त हमक़दम हुए
कुछ राहों से मैं गुज़र गयी
कभी इधर तो कभी उधर गयी
परिवर्तन हुआ शख़्सियत में
थोड़ा बिगड़ी कुछ सुधर गयी...

इस सुधार को मैंने अपना,
जीस्त-ओ-जुनूँ कर लिया है।
दिल के इक कोने के अंदर,,
इस साल को क़ैद कर दिया है।।

मस्ती भरे कुछ लम्हें मिले
कभी ख़ामखाँ मैंने लब सिले
कुछ ग़मों को दिल से दूर किया
उन्हें हँसने को मजबूर किया
कुछ आँसुओं को पी लिया
इक लम्हा जी भर जी लिया...

हर हसीं जज़बात को,
अब वैध कर लिया है।
दिल के इक कोने के अंदर,,
इस साल को क़ैद कर दिया है।।

आज साल की आख़िरी रात है
कल नए साल की शुरुआत है
आज उम्मीद नयी लगाऊँगी
तो कल पूरी कर पाऊँगी
इक दास्ताँ नयी बनाऊँगी
मैं बस चलती जाऊँगी...

कुछ नए सपनों के साथ,
नए साल का स्वागत करना है।
दिल के दूजे टुकड़े के अंदर
उसको भी क़ैद करना है।।  


Sunday, 14 August 2016

उल्झे हुए ख़याल............

मुझमें भी कुछ मर रहा है,
शायद ख़्वाहिश है उसका नाम।
ख़्वाहिश- जीने की, मुस्कुराने की,,
रिश्ते निभाने की।।

साँसें चलती तो हैं,
महसूस मग़र कुछ कम होता है।
दिल के अंदर तक ख़ुशी की,,
कोई बात नहीं पहुँचती।।

दुनिया की इस अंधी भीड़ से,
खौफ़-सा आता है मुझको।
ये जीवन भी जैसे कोई,,
तंज़ मालूम होता है।।

मेरे अपने लोग क्यों अचानक ही,
मुझको पराये-से लगते हैं।
तलाशती हूँ हर पल एक वजह,,
कि उनकी रूह से बात हो जाए।।

आँखों में जो ख़्वाब थे,
हाथों की लकीरों से अब।
डरे-डरे से रहते हैं,,
हथेलियों से कुछ कहते हैं।।

होठों की मुस्कान किसी,
अजनबी का एहसास दिलाती है।
देख जिसे बदन में मेरे,,
कंपन-सी उठ जाती है।।

एक हज़ार सवालों से,
सिर मेरा दुखता है।
शक़ वाला जो काँटा है,,
बहुत ज़ोर से चुभता है।।

आँसू कई बार आँखों से,
बाहर आना तो चाहते हैं।
तमाशबीन दुनिया के कारण,,
आँखों में ही रह जाते हैं।।

एक एहसास है कहीं,
मुझको महसूस होता है।
मरा हुआ-सा है वो लेकिन,,
मेरा दिल नहीं छूता है ।।

ज़िंदा दिखना भी मग़र इस दुनिया में,
बेइन्तेहाँ ज़रूरी है।
झूठा ही सही चाहे,,
मुस्कुराना ज़रूरी है।।

बेवजह के ख़याल आजकल,
मुझको हैराँ किया करते हैं।
जी रहे हैं हम फिर भी,,
हर पल में क्यों मरते हैं??

क्या जाने ये,
कैसा दौर है?
ये लिखने वाला भी,,
मैं हूँ या कोई और है??

Tuesday, 12 April 2016

याद

1. मुश्क़िल था बहुत उसके लिए हर शाम उस राह से गुज़रना,
जहाँ 'उसके' साथ वो बस एक शाम चली थी।

2. मिलने की उससे वो अब कोई उम्मीद नहीं रखती,
डर है उसको कहीं फिर इश्क़ न हो जाए। 
 
3. हर शाम वो लम्हें याद किया करती थी बस,
वो शख़्स तो उसके ज़हन से कब का निकल चुका था।

4. वो भूला नहीं था शायद उसको,
इसलिए उसे भी 'वो' याद दिन-रात आया करता था।

5. हक़ीक़तों से इश्क़ करता था 'वो,'
वो मग़र उसी के साथ सपने सजाती थी। 
 
6. सुन तो लिया था उसने उसको,
अब धीरे-धीरे बुन रही थी। 
 
7. वो इत्मिनान से कहाँ मिला करती थी उससे, 
'वो' बस राह में टकरा जाया करता था। 
 
8. भूला कहाँ था वो उसको,
वो बिना वजह ही शिकायत करती थी। 
 
9. 'वो' दोस्त से ज़्यादा कुछ ना समझ सका उसको,
वो मग़र इश्क़ को दोस्ती से अलग ना कर पायी। 
 
10. हर दिन बातें करते तो थे वो,
हर रात फिर भी कुछ अनकहा रह जाता था।

Friday, 19 February 2016

मग़र...

1. छुआ नहीं था कभी उसने उसको,
गले लगाने की मग़र चाह उमड़ती थी। 

2. छोड़ गया था वो उसे उन तन्हा रास्तों पर,
उसके क़दमों की आहट आज भी जहाँ वो सुनती है। 

3. भीड़ का हिस्सा कैसे कर सकती थी वो उसे,
ज़हन में उसके बसता था वो शख़्स।

4. वो अचानक ही ख़ामोश हो गया था,
इसलिए 'उसकी' कलम इतना बोलने लगी थी। 

5.  वो अकसर समझदार बताया करता था उसको,
हाल-ए-दिल मग़र उसका वो कहाँ समझती थी।   

6. वाक़िफ़ होने लगी थी उसकी आनाकानियों से वो,
दिल को मग़र अपने बहला नहीं पाती थी। 

7. वो दिल की बात कह तो देती मग़र,
जानती थी सच सुनने का हौंसला उसमें नहीं है। 

8. आंधी की तरह आया था एक शख़्स, 
टूटे पत्ते की तरह जिसके साथ वो बहती चली गई। 

9. वो खुश रहे बस इस ख़ातिर,
'उसका' साथ होना ज़रूरी था।

10. उस महफ़िल का हिस्सा होकर क्या करे वो,
तवज्जो देने को उसे जहाँ  'वो' न हो। 

   



Tuesday, 3 November 2015

ये ज़िन्दगी है मेरी........

ये ज़िन्दगी है मेरी, पर मैं नहीं हूँ
सारी दुनिया है सही, बस मैं नहीं हूँ।

न जाने कैसी कश्मकशों का दौर है,
आईने में क्यों दिखता कोई और है।
किसी के लिए मैं मुझ-सी ही नहीं हूँ,,
हाँ, ये ज़िन्दगी है मेरी पर मैं नहीं हूँ।।

भीड़ का हिस्सा हो जाना मंज़ूर नहीं था,
जीने का तो मगर मुझको सबूर नहीं था।
धीरे-धीरे तरीका वो सीख रही हूँ,,
ये ज़िन्दगी तो है मेरी पर मैं नहीं हूँ।।

हार मान जाने को जी नहीं करता,
कोशिश कर-कर के ये मन नहीं भरता।
अक्सर राहों में ठोकर खा गिरी हूँ,,
ये ज़िन्दगी है मेरी पर मैं नहीं हूँ।।

मन मारने की आदत-सी हो गई है,
हर एक ख्वाहिश ज़हर पी के सो गई है।
मर-मर के आजकल मैं जीने लगी हूँ,,
ये ज़िन्दगी है मेरी पर मैं नहीं हूँ।।   

सारी दुनिया है सही, बस मैं नहीं हूँ
ये ज़िन्दगी है मेरी, पर मैं नहीं हूँ।

Friday, 1 May 2015

जज़बात (भाग- 2)

1. मैं रश्क़ हूँ तेरे सीने की,
ख़लिश करती है जो दिल में तेरे। 

2. उन आँखों में शायद तारीफ़ थी हमारी,
ग़र समझ जाते तो आज तन्हा न होते। 

3. मेरी आँखों के मंज़र तू पढ़ता है अगर,
दिल की आवाज़ को सुनता क्यों नहीं। 

4. है एक कश्मकश कैसे कहूँ,
जज़बात को अल्फ़ाज़ नहीं मिलते।  

5. ख़ास कह दिया है तुमने हमको जब से अपना,
ये दिल बस कश्मकशों के समुंदर में हिचकोले खा रहा है। 

6. कह पाते नहीं जो कभी किसी से,
जज़बात वो काग़ज़ पर उतार देते हैं हम। 

7. जकड़े हुए थे जज़बात जो दिल में कभी,
वो अब फ़िज़ाओं संग बह रहे हैं। 

8. कर लूँ इश्क़ इस बंजारेपन से, 
या ख़्वाबों में उनकी राह तकती जाऊँ। 

9. हुनर है मुझमें तेरी ख़ामोशियों को पढ़ लेने का,
यूँहीं मुझको तू बेवफ़ा ना समझ।

10. सहारे की ज़रुरत नहीं हमको,
बस एक तेरे साथ की उम्मीद है।


Tuesday, 24 March 2015

चुलबुले हमारे चूहेराम

चुलबुले हमारे चूहेराम,
कभी न करते थे आराम।
कूदते रहते यहाँ से वहाँ,,
जाने उनको जाना था कहाँ।।

भागते रहते इधर-उधर,
थी न उनको कुछ भी ख़बर।
नाक में थोड़ा दम थे करते,,
जितना मारो नहीं सुधरते।।

बढ़ा देते थे हमारा काम,
चुलबुले हमारे चूहेराम।

नन्हे से आये थे घर में,
रहते थे दिल के अंदर में।
करते थे बहुत शैतानी,,
बात हमारी कभी न मानी।।

न करने देते हमको आराम,
चुलबुले हमारे चूहेराम।

चले गए हैं छोड़कर हमको,
छोड़ गए हैं इस वतन को।
हुए वीरगति को प्राप्त,,
कभी किया नहीं हम पे आघात।।

किया रोशन हमारा नाम,
चुलबुले हमारे चूहेराम।

अब हमसे दूर हो गए तुम,
हम हैं तुम्हारी याद में गुम।
जी भर के अब करो विश्राम,,
चुलबुले हमारे चूहेराम।।

वो मासूम सी निंदिया तुम्हारी,
वो उबासी बहुत ही प्यारी।
सब हमको बहुत सतायेगा,,
हर लम्हा अब याद आएगा। .

पर तुम सदा रहोगे हमारी शान,
चुलबुले हमारे चूहेराम।