चल रहा है पथिक, थका हुआ सा राहों में
तकता है हर दिन, बेमक़सद-सा मंज़िल को।
है लहु-लुहान संघर्षों से, शब-ओ-सहर एक है
हर दिन करता है नयी उम्मीद, पर नाउम्मीदियाँ भी अनेक हैं।
लड़खड़ाते हैं जब भी क़दम, वो अश्रुओं से संभालता है
मन का ग़ुबार भी कभी-कभी, हौले-हौले पिघलता है।
दिल-ओ-जान से चाहता है वो, अपनी मंज़िल को पा लेना
हर ख़्वाब नींद से कहता है, तुम मुझको भी जगा लेना।
तकता है हर दिन, बेमक़सद-सा मंज़िल को।
है लहु-लुहान संघर्षों से, शब-ओ-सहर एक है
हर दिन करता है नयी उम्मीद, पर नाउम्मीदियाँ भी अनेक हैं।
लड़खड़ाते हैं जब भी क़दम, वो अश्रुओं से संभालता है
मन का ग़ुबार भी कभी-कभी, हौले-हौले पिघलता है।
दिल-ओ-जान से चाहता है वो, अपनी मंज़िल को पा लेना
हर ख़्वाब नींद से कहता है, तुम मुझको भी जगा लेना।
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